Nitish Kumar PTI

अंक और गिनती से पनपी गणित की दर्ज़नों शाखाएँ हैं। अंकगणित, बीजगणित, ज्यामिति वग़ैरह से तो सभी परिचित हैं। गणित विज्ञान है। विज्ञान की तरह गणित के भी नियम और सिद्धान्त अकाट्य होते हैं। तभी तो पूरे ब्रह्मांड में हर जगह दो और दो, चार ही होता है। लेकिन ‘सियासी-गणित’ ऐसी विचित्र विधा है जिसमें ‘चार’ कभी ‘साढ़े तीन’ बन जाता है तो कभी ‘साढ़े चार’। मज़ेदार तो ये है कि दुनिया भर में ‘राजनीति-विज्ञान’ ऐसे ही बेतुके नियमों से चलती है। इसीलिए पुराने तज़ुर्बों की बदौलत राजनीतिक प्रेक्षक भी तमाम तिकड़मों की समीक्षा करते हैं।

अभी बिहार की राजनीति सबसे मौजूँ है। वहाँ सियासी बिसात पर सभी ख़ेमे भीतरघाती चालें ही चल रहे हैं। इसने घाट-घाट का पानी पीये नीतीश कुमार की दशा ‘पानी में मीन प्यासी’ वाली बना दी है। ऐन चुनावी बेला पर ‘कुर्सी कुमार’ के नाम से धन्य नीतीश बाबू की आँखों में धूल झोंककर किरकिरी पैदा करने का काम जहाँ प्रत्यक्ष में ‘मौसम विज्ञानी’ राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी कर रही है तो परोक्ष रूप से इसे बीजेपी का आला नेतृत्व इसे हवा दे रहा है। सभी नाज़ुक वक़्त का फ़ायदा उठाने की फ़िराक़ में हैं।

बिहार के चुनावी महाभारत में चिराग़ पासवान में उस अर्जुन का चेहरा दिख रहा है जो शिखंडी की तरह बाग़ियों और दलबदलुओं के पीछे छिपकर नीतीश जैसे भीष्म को निपटाने के लिए आतुर है। फ़र्क़ इतना है कि कुरुक्षेत्र में भीष्म ने ख़ुद ही शिखंडी का नुस्ख़ा बताया था जबकि बिहार में बीजेपी ने इतिहास से सबक सीखने की रणनीति बनायी है। इसी रणनीति के तहत महीनों से अधिक सीटों के नाम पर शुरू हुई खींचतान ने ‘दो-एनडीए’ पैदा कर दिये हैं। दोनों एनडीए असली हैं क्योंकि दोनों में बीजेपी मौजूद है।

दरअसल, बीजेपी ने ख़ुद को टीम-ए और टीम-बी में बाँट लिया है। टीम-ए में बीजेपी के साथ औपचारिक तौर पर नीतीश हैं तो टीम-बी में अनौपचारिक तौर पर चिराग़। कृष्ण की तरह मोदी-शाह ने अपनी सेना तो कौरव रूपी नीतीश तो दे दी है, लेकिन ख़ुद युद्ध नहीं करने का संकल्प लेकर चिराग़ रूपी पाँडवों के साथ हैं। संघ के खाँटी नेताओं या कार्यकर्ताओं का बीजेपी के ‘कमल’ को डंके की चोट में हाथ में थामे रखकर चिराग़ की ‘झोंपड़ी’ में जाना अनायास नहीं है। टिकट तो बस बहाना है। बग़ावत छलावा है। मक़सद तो मौक़ा पाकर नीतीश को ठिकाने लगाना है।

बीजेपी ने चिराग़ के चुनाव-चिन्ह की बदौलत चोर दरवाज़े से नीतीश के मुक़ाबले अपने ज़्यादा उम्मीदवारों को मैदान में उतारने का खेल खेला है। इसीलिए चिराग़ के पास जाकर टिकट पाने वाले संघी नेता बहुत गर्व से कहते हैं कि उन्होंने घर बदला है, विचारधारा या संस्कार नहीं है। ये ‘दोस्ताना मुक़ाबले’ का सबसे शानदार फ़रेब है कि विरोधी ख़ेमे में भी अपने ही उम्मीदवार मौजूद हों। यानी, ‘ये’ जीते या ‘वो’, संख्या तो अपनी ही बढ़ेगी। फिर भी यदि कसर रह जाएगी तो चुनाव के बाद जनता दल यूनाइटेड में वैसी ही तोड़-फोड़ क्यों नहीं होगी, जैसे हम अनेक मौकों पर देख चुके हैं। विधायकों की मंडी लगाना बीजेपी के लिए बायें हाथ का खेल है।

लिहाज़ा, ये चिराग़ का सियासी ढोंग या पैंतरा नहीं तो फिर और क्या है कि हम मोदी के साथ तो हैं लेकिन मोदी जिसके साथ हैं उसके साथ नहीं हैं। ये फ़रेब नहीं तो फिर और क्या है कि ‘नीतीश की ख़ैर नहीं, मोदी से बैर नहीं’? अकाली, शिवसेना और तेलगू देशम् ने एनडीए और बीजेपी से नाता तोड़ा तो सत्ता की मलाई खाने के लिए मोदी की गोदी में ही नहीं बैठे रहे। लेकिन पासवान ऐसे नहीं हैं। उन्हें भी नीतीश की तरह जीने के लिए सत्ता की संजीवनी चाहिए ही। नीतीश-पासवान, दोनों ही इस पाखंड की गिरफ़्त हैं कि उनकी दोस्ती सिर्फ़ बीजेपी से है। हालाँकि, राज्यसभा की सीट लेने के लिए पासवान ने थोड़ी देर के लिए नीतीश को दोस्त मानने में ही अपना स्वार्थ देखा।

ज़ाहिर है, बीजेपी भी साफ़-साफ़ बोलकर तो नीतीश को ठिकाने लगाएगी नहीं, इसीलिए महीनों से बयान जारी होते आये हैं कि मुख्यमंत्री का चेहरा वही रहेंगे। चिराग़ ने नीतीश के उम्मीदवारों के ख़िलाफ़ अगड़ी जाति के लोगों को टिकट देने की रणनीति बनायी है। ताकि अगड़ी जाति वाले बीजेपी के वोट नीतीश के उम्मीदवारों को नहीं मिले। इस तरह, चिराग़ के उम्मीदवार यदि नहीं भी जीतें तो नीतीश के लिए वोट-कटुआ तो बन ही जाएँ। उधर, बीजेपी के कोटे वाली सीटों पर नीतीश के वोटरों के लिए कमल की अनदेखी करना सम्भव नहीं होगा। गठबन्धन की वजह से नीतीश के समर्थकों को भी बीजेपी को वोट देना ही पड़ेगा।

लगता है कि बीजेपी और एलजेपी की रणनीति है कि ‘सुशासन बाबू’ को सही वक़्त पर उनके उसी हथकंडे से ठिकाने लगाया जाए जिससे 2015 में उन्होंने पहले 17 साल पुराने दोस्त बीजेपी को और फिर 2017 में महागठबन्धन को गच्चा दिया था। इसीलिए अबकी बिहार चुनाव का सबसे दिलचस्प सवाल ये बन गया कि अव्वल दर्ज़े के ‘गच्चेबाज़’ और अव्वल दर्ज़े के ‘सौदागार’ में से बाज़ी कौन मारेगा? नीतीश बाबू यदि ‘पलटी-मार’ हैं तो बीजेपी भी उनसे कतई कम नहीं है। इसके मौजूदा कर्णधारों को विधायकों को ख़रीदने, राज्यपालों से मनमर्ज़ी फ़ैसले करवाने और मुक़दमों-छापों के ज़रिये विरोधियों का चरित्रहनन करके अन्ततः सत्ता हथियाने में महारत हासिल है।

ऐसा नहीं है कि नीतीश को ये खेल समझ में नहीं आ रहा है। उनके पास दोस्तों के पीठ या सीने में छुरा भोंकने का इतना तज़ुर्बा है कि उन्होंने उड़ती चिड़िया के पंख गिन लिये। नीतीश को साफ़ दिख रहा है चिराग़ की पार्टी से बीजेपी के बाग़ी नहीं बल्कि सिपाही पा रहे हैं टिकट। कई महीने से नीतीश बारम्बार बीजेपी को आगाह करते रहे कि पासवान को सेट कीजिए। बीजेपी उन्हें तरह-तरह से गच्चा देती रही ताकि वक़्त निकलता चला जाए। अन्त में, नीतीश को चक्रव्यूह में फँसाने के लिए चिराग़ से नौटंकी करवायी गयी। ख़ुद को चक्रव्यूह में घिरा पाकर नीतीश ने सख़्त नाराज़गी जतायी तो ‘सियासी-मरहम’ लगाते हुए बीजेपी ने साझा प्रेस कांफ्रेंस के दौरान 44 सेकेंड में 5 बार नीतीश के नेतृत्व में आस्था जता दी।

‘डैमेज़ कंट्रोल’ के नाम पर कहा गया कि मोदी के नाम पर चिराग़ वोट नहीं मान सकते। फ़िलहाल, मोदी का ‘कॉपीराइट’ नीतीश के पास है। चिराग़ पर अपनी पार्टी के बैनर-पोस्टर में बीजेपी के नेताओं के इस्तेमाल पर भी रोक लगा दी गयी। लेकिन एलजेपी को एनडीए से बाहर नहीं किया गया। क्योंकि चिराग़ जो कुछ भी करते रहे हैं उसकी रणनीति तो बीजेपी ने बनायी है। एकलव्य की तरह चिराग़ भी मोदी को ही द्रोणाचार्य बता रहे हैं तो बीजेपी कह रही है कि वो गुरु-दक्षिणा में अंगूठा नहीं माँग सकती, क्योंकि ये द्वापर नहीं बल्कि घोर-कलियुग है। लीपा-पोती की ख़ातिर ये एलान ज़रूर हो गया कि चुनाव के बाद चाहे नीतीश की सीटें कम भी रह जाएँ लेकिन मुख्यमंत्री पद के दावेदार वही रहेंगे।

बीजेपी की ऐसी ‘राजनीतिक प्रतिज्ञाओं’ पर जिन्हें यक़ीन हो उन्हें भी शातिर ही मानना चाहिए। नीतीश हों या पासवान या संघ के मोदी-शाह, सबका रिकॉर्ड दग़ाबाज़ियों से भरपूर रहा है। मौजूदा दौर की राजनीति में तमाम जाने-पहचाने दस्तूर हैं। चाल-चरित्र-चेहरा तो कब का बेमानी हो चुका है। यहाँ कोई किसी का सगा नहीं। येन-केन-प्रकारेण सबको सत्ता, कुर्सी और ओहदा चाहिए। राजनीति में जनहित की बारी आत्महित के बाद ही आती है। जनता लाख छटपटाये लेकिन उसे इसी भंवर या दलदल में जीना पड़ता है।

यही भंवर फ़िलहाल, बिहार में सियासी बवंडर बना हुआ है। अभी वहाँ भीतरघातियों और दलबदलुओं का बाज़ार उफ़ान पर है। वहाँ टिकटों के बँटवारे की अन्तिम घड़ी तक सभी नेता, पार्टियाँ और गठबन्धन एक-दूसरे को लूट-ख़सोटने पर लगे हैं। राजनीति में इन लुटेरों को बाग़ी भी कहते हैं। आपराधिक छवि या पृष्ठभूमि वाले नेताओं की तरह बाग़ियों का ख़ानदान भी हर पार्टी में मौजूद है। सभी ने बग़ावत, दग़ाबाज़ी और भीतरघात के संस्कार अपने आला-नेताओं से ही सीखें हैं।

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