Nitish Kumar Lalu Yadav

अरूणाचल प्रदेश जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) इकाई के छह विधायकों के भारतीय जनता पार्टी में शामिल होते हीं, इसने बिहार की सियासी फिजाओं में फिर से पुराने सुर को हवा दे दी। जेडीयू की तरफ से बार-बार ये सफाई दी जा रही है कि बिहार एनडीए में कोई दिक्कत नहीं है फिर भी विपक्ष अपने मौके की तलाश में जुटी हुई है।

भाजपा और जेडीयू में बढ़ रही दूरियों के संकेत को विपक्ष किसी भी कीमत पर भुनाने से चूकना नहीं चाहती है। पहले राष्ट्रीय जनता दल (राजद) नेता श्याम रजक ने दावा किया कि जेडीयू के 17 विधायक उनके संपर्क में हैं। वहीं, रांची रिम्स में इलाज करवा रहे पार्टी सुप्रीमों लालू यादव की भी नजर बिहार की राजनीति और नीतीश पर है। हालांकि, राजद के दावों को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने खुद बयान देकर कहा था कि ये सभी बेबुनियाद है।

अब नए साल के मौके पर राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने नीतीश कुमार को लेकर कहा है कि नीतीश कुमार का महागठबंधन में स्वागत है यदि वो आना चाहते हैं। राबड़ी यही नहीं रूकी। उन्होंने यहां तक कह दिया कि इसको लेकर राजद के नेता विचार कर रहे हैं। याद कीजिए कि कुछ दिन पहले हीं राजद के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद मनोज झा ने भी कहा था कि 40-45 सीटें जीतने के बाद भी सीएम नीतीश की ऐसी बेबसी कभी नहीं देखी। स्पष्ट है कि राजद अब नीतीश को लुभाने में जुटी हुई है। और इसके साथ वो तेजस्वी का भविष्य देख रही है।

लालू और नीतीश के संबंध 2017 में महागठबंधन से अलग होने के बाद भी अच्छे बताए जाते हैं और अभी भी नीतीश लालू को दोस्त मानते हैं। याद कीजिए, राज्य में एनडीए की सरकार बनने के बाद 17 वीं बिहार विधानसभा के विशेष सत्र के अंतिम दिन जब नीतीश और तेजस्वी के बीच जमकर कहासुनी हुई थी। उस दौरान भी नीतीश ने कहा था, “मैं कुछ नहीं बोलता हूं क्योंकि इनके पिता मेरे अच्छे दोस्त हैं। ये मेरे भाई समान व्यक्ति का बेटा है।“

आउटलुक से बातचीत में बीबीसी के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक मणिकांत ठाकुर कहते हैं, “अभी की राजनीति में कौन किसके साथ कब है, कुछ नहीं कहा जा सकता। राजद सत्ता परिवर्तन की ताक में बैठी हुई है। वहीं, वो अपने भूत और भविष्य दोनों को देख रही है। नीतीश भी खुले तौर पर नहीं दिखना चाहते हैं कि उनकी वजह से एनडीए टूट गई। इसिलिए, वो इंतजार कर रहे हैं कि पानी थोड़ा और सर से गुजरे। वहीं, बीजेपी यदि इस बात को ठान लेती है कि नीतीश के बिना उसे राज्य में राजनीति करनी है तो ये दृश्य बन सकता है।”

इससे पहले भी साल 2015 विधानसभा चुनाव से पहले जब सीएम नीतीश ने भाजपा के साथ पीएम मोदी को लेकर हुई तनातनी की वजह से एनडीए से रिश्ता तोड़ लिया था। उस वक्त भी नीतीश ने लालू के साथ आना मुनासिब समझा। नीतीश ने कभी लालू के राज को ‘जंगलराज’ बताया था। 2014 लोकसभा चुनाव में जब जेडीयू को महज दो सीटें मिली थी तब उन्होंने अगले विधानसभा चुनाव में लालू के साथ हो लिये और राजद-कांग्रेस से हाथ मिला लिया।

आगे मणिकांत ठाकुर कहते हैं, “नीतीश ने बिहार की राजनीति से सन्यास लेने की बात कही है। हो सकता है कि वो मौजूदा विपक्ष के सामने शर्त रखें कि अगले लोकसभा चुनाव में उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पीएम मोदी के प्रतिद्वंदी के तौर पर समर्थन किया जाए। और वो राज्य में राजद को मौका दें। नीतीश भी इसी की तलाश में हो सकते हैं।”

अरूणाचल मुद्दे के बाद भी कांग्रेस ने नीतीश को सरकार बनाने का न्योता दे दिया है। बीते दिनों कांग्रेस विधायक दल के नेता अजीत शर्मा ने कहा कि पहले भी वो हमारे साथ थे यदि वो आना चाहते हैं तो उनका स्वागत है।

नीतीश कुमार कई मुद्दों पर भाजपा से अलग सुर अख्तियार करते रहे हैं। चाहे वो अनुच्छेद 370 का मामला हो या नागरिकता संशोधन कानून का। मणिकांत ठाकुर कहते हैं कि नीतीश भाजपा की खींची राष्ट्रीय हिंदुत्व वाली लकीर से अलग चलते रहे हैं। अनुच्छेद 370 को लेकर जब बिल सदन में लाया गया था तो जेडीयू ने इसका समर्थन करने की बजाय विरोध किया था। कई मुद्दे हैं जिनको लेकर आने वाले दिनों में नीतीश कह सकते हैं कि उन्हें बीजेपी के साथ सरकार चलाने में दिक्कत हो रही है और अपनी छवि को बचाते हुए वो गठबंधन से अलग हो सकते हैं।

नीतीश के मन में एक और डर को राबड़ी देवी ने पैदा कर दिया है। उन्होंने कहा है कि बिहार में भी जेडीयू विधायकों को बीजेपी तोड़ सकती है। हालांकि, पूर्व मुख्यमंत्री और एनडीए के सहयोगी घटक दल हम नेता जीतन राम मांझी और जेडीयू के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष आरपीसी सिंह ने सीधे तौर पर बीजेपी को चेतावनी दी । उन्होंने कहा कि आगे से बीजेपी ऐसी भूल न करे। वहीं, आउटलुक से पिछले दिनों बातचीत में पार्टी के प्रवक्ता अजय आलोक ने भी कहा था कि बीजेपी इकाई को ये सोचना चाहिए कि वो किसे शामिल कर रही है। जेडीयू का चेहरा नीतीश हैं और रहेंगे।

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